📿 श्लोक संग्रह

त्रैगुण्यविषया वेदाः

गीता 2.45 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ॥
त्रैगुण्यविषयाः वेदाः
वेद तीन गुणों का विषय करते हैं
निस्त्रैगुण्यः भव
तीन गुणों से परे हो जाओ
अर्जुन
हे अर्जुन
निर्द्वन्द्वः
द्वंद्वों से रहित
नित्यसत्त्वस्थः
सदा सत्त्व में स्थित
निर्योगक्षेमः
प्राप्ति-रक्षा की चिंता से मुक्त
आत्मवान्
आत्म-परायण

कृष्ण कहते हैं — वेद तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) के विषयों को बताते हैं; हे अर्जुन, तुम तीन गुणों से परे हो जाओ। द्वंद्वों से रहित, सदा सत्त्व में स्थित, प्राप्ति-रक्षा की चिंता से मुक्त और आत्म-परायण बनो।

यह एक ऊँचा आदर्श है। तीन गुणों से परे — यानी न सिर्फ़ सात्त्विक बनो, बल्कि गुणों की आसक्ति से ही ऊपर उठो। जैसे नदी के किनारे खड़ा पेड़ न बाढ़ में बहता है, न सूखे में सूखता — वैसे ही गुणातीत पुरुष परिस्थितियों से अप्रभावित रहता है।

भगवद्गीता में यह श्लोक 2.44 के बाद आता है जहाँ भोग-आसक्ति की बात थी। यहाँ कृष्ण उससे आगे का मार्ग दिखाते हैं — गुणातीत अवस्था।

'निर्योगक्षेम' — यह पाना और जो पाया उसकी रक्षा करना — इन दोनों की चिंता से मुक्ति। यही वास्तविक स्वतंत्रता है।

अध्याय 2 · 45 / 72
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