कृष्ण कहते हैं — जिनका मन भोग और ऐश्वर्य में आसक्त है और उस (फूलों जैसी) वाणी से हरा हुआ है — उनमें समाधि में दृढ़ निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। यह 2.42–2.44 के खंड का निष्कर्ष है।
आसान शब्दों में — जब मन हज़ार चीज़ों में बँटा हो, तो वह एकाग्र नहीं हो सकता। जैसे जो पानी हर तरफ बहता है वह किसी एक जगह गहरा नहीं होता — वैसे ही जो मन भोग में बिखरा हो वह समाधि की गहराई नहीं पा सकता।