📿 श्लोक संग्रह

भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्

गीता 2.44 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥
भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्
भोग और ऐश्वर्य में आसक्त लोगों के
तया अपहृतचेतसाम्
उस (वाणी) से हरे चित्त वालों के
व्यवसायात्मिका बुद्धिः
निश्चयात्मिका बुद्धि
समाधौ
समाधि में
न विधीयते
नहीं होती, नहीं स्थापित होती

कृष्ण कहते हैं — जिनका मन भोग और ऐश्वर्य में आसक्त है और उस (फूलों जैसी) वाणी से हरा हुआ है — उनमें समाधि में दृढ़ निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। यह 2.42–2.44 के खंड का निष्कर्ष है।

आसान शब्दों में — जब मन हज़ार चीज़ों में बँटा हो, तो वह एकाग्र नहीं हो सकता। जैसे जो पानी हर तरफ बहता है वह किसी एक जगह गहरा नहीं होता — वैसे ही जो मन भोग में बिखरा हो वह समाधि की गहराई नहीं पा सकता।

भगवद्गीता में यह श्लोक 2.41 की व्यवसायात्मिका बुद्धि की अवधारणा से जुड़ता है। वहाँ बताया था कि एकनिष्ठ बुद्धि एक होती है — यहाँ बताते हैं कि भोग-आसक्ति उस एकनिष्ठता को भंग करती है।

'समाधौ न विधीयते' — समाधि में नहीं होती — यह कठोर लेकिन स्पष्ट निष्कर्ष है।

अध्याय 2 · 44 / 72
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