📿 श्लोक संग्रह

योगस्थः कुरु कर्माणि

गीता 2.48 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
योगस्थः
योग में स्थित होकर
कुरु
करो
कर्माणि
कर्म
सङ्गम्
आसक्ति को
त्यक्त्वा
त्यागकर
धनञ्जय
हे धनंजय (अर्जुन)
सिद्ध्यसिद्ध्योः
सफलता और असफलता में
समः भूत्वा
समान होकर
समत्वम्
समता
योगः उच्यते
योग कहलाती है

यह श्लोक गीता 2.47 के ठीक बाद आता है और उसे पूरा करता है। कृष्ण कहते हैं — आसक्ति छोड़कर, योग में स्थित होकर कर्म करो। सफलता और असफलता दोनों में समान भाव रखो। यही समता योग कहलाती है।

कितनी सुंदर परिभाषा है योग की — 'समत्वं योग उच्यते' — समता ही योग है। न सफलता में फूलो, न असफलता में कुम्हलाओ। बस अपना काम करते रहो।

जैसे एक अनुभवी नाविक — तूफान आए या शांति हो — अपनी नाव चलाता रहता है। वह न तूफान से डरता है, न शांत समुद्र में लापरवाह होता है।

इस श्लोक में 'समत्वं योग उच्यते' गीता की सबसे प्रसिद्ध परिभाषाओं में से एक है। योग का अर्थ केवल आसन या ध्यान नहीं — समत्व ही योग है।

2.47 और 2.48 मिलकर कर्मयोग का पूरा सार प्रस्तुत करते हैं — कर्म करो, फल की चिंता छोड़ो, सफलता-असफलता में सम रहो।

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