कृष्ण कहते हैं — हे धनंजय, बुद्धियोग की तुलना में सकाम कर्म बहुत हीन है। बुद्धि की शरण लो। जो लोग फल की इच्छा से कर्म करते हैं, वे दयनीय हैं। 'कृपणाः' — दयनीय — यह शब्द बहुत तीखा है।
कृष्ण बताते हैं कि फल-आशा से कर्म करना एक सीमित और क्षुद्र दृष्टि है। जैसे एक बच्चा इनाम के लिए पढ़े और एक बच्चा ज्ञान के आनंद के लिए — दोनों पढ़ते हैं लेकिन उनकी यात्रा अलग है।