📿 श्लोक संग्रह

दूरेण ह्यवरं कर्म

गीता 2.49 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय ।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥
दूरेण अवरम्
बहुत हीन, बहुत नीचे
कर्म
कर्म (सकाम कर्म)
बुद्धियोगात्
बुद्धियोग की तुलना में
धनञ्जय
हे धनंजय (अर्जुन)
बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ
बुद्धि की शरण लो
कृपणाः
दयनीय, कृपण
फलहेतवः
फल को कारण मानने वाले

कृष्ण कहते हैं — हे धनंजय, बुद्धियोग की तुलना में सकाम कर्म बहुत हीन है। बुद्धि की शरण लो। जो लोग फल की इच्छा से कर्म करते हैं, वे दयनीय हैं। 'कृपणाः' — दयनीय — यह शब्द बहुत तीखा है।

कृष्ण बताते हैं कि फल-आशा से कर्म करना एक सीमित और क्षुद्र दृष्टि है। जैसे एक बच्चा इनाम के लिए पढ़े और एक बच्चा ज्ञान के आनंद के लिए — दोनों पढ़ते हैं लेकिन उनकी यात्रा अलग है।

भगवद्गीता में 'बुद्धियोग' का अर्थ है विवेक-युक्त कर्म — जहाँ बुद्धि फल की चाह से नहीं, धर्म-विवेक से कार्य करती है। यह 2.47 के 'मा फलेषु कदाचन' का विस्तार है।

'कृपणाः' शब्द यहाँ बड़ा अर्थपूर्ण है — जो धन संचय में कृपण हो वह कंजूस, जो जीवन की संभावनाओं में कृपण हो वह भी। फल की आशा से बँधा व्यक्ति जीवन की बड़ी संभावना से वंचित रहता है।

अध्याय 2 · 49 / 72
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