📿 श्लोक संग्रह

बुद्धियुक्तो जहातीह

गीता 2.50 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥
बुद्धियुक्तः
समबुद्धि वाला
जहाति
त्याग देता है
इह
इस लोक में
उभे
दोनों
सुकृतदुष्कृते
पुण्य और पाप
तस्मात्
इसलिए
योगाय
योग के लिए
युज्यस्व
लग जाओ
योगः
योग
कर्मसु कौशलम्
कर्मों में कुशलता है

कृष्ण कहते हैं — जो समबुद्धि से युक्त है, वह इसी जीवन में पुण्य और पाप दोनों से मुक्त हो जाता है। इसलिए योग में लग जाओ — योग कर्म करने की कुशलता है।

'योगः कर्मसु कौशलम्' — यह गीता की एक और अमर परिभाषा है। योग का अर्थ है कर्म करने की कला, कर्म करने का सही तरीका। जब कोई निष्काम भाव से, समत्व से कर्म करता है — वही कुशल कर्म है।

जैसे एक कुशल रसोइया — वही सामग्री लेता है जो सबके पास है, लेकिन उसका बनाया भोजन अलग होता है। फ़र्क सामग्री में नहीं, कुशलता में है। वैसे ही कर्म तो सब करते हैं, लेकिन योगी कुशलता से करता है।

इस श्लोक की दो पंक्तियाँ दो अलग-अलग विचार प्रस्तुत करती हैं — पहली पंक्ति पुण्य-पाप से मुक्ति की बात करती है, दूसरी योग को कर्म-कुशलता के रूप में परिभाषित करती है।

यह गीता 2.47-50 का चरम बिंदु है — कर्म करो (2.47), समत्व रखो (2.48), और कुशलता से करो (2.50)।

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