कृष्ण कहते हैं — जो समबुद्धि से युक्त है, वह इसी जीवन में पुण्य और पाप दोनों से मुक्त हो जाता है। इसलिए योग में लग जाओ — योग कर्म करने की कुशलता है।
'योगः कर्मसु कौशलम्' — यह गीता की एक और अमर परिभाषा है। योग का अर्थ है कर्म करने की कला, कर्म करने का सही तरीका। जब कोई निष्काम भाव से, समत्व से कर्म करता है — वही कुशल कर्म है।
जैसे एक कुशल रसोइया — वही सामग्री लेता है जो सबके पास है, लेकिन उसका बनाया भोजन अलग होता है। फ़र्क सामग्री में नहीं, कुशलता में है। वैसे ही कर्म तो सब करते हैं, लेकिन योगी कुशलता से करता है।