📿 श्लोक संग्रह

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि

गीता 2.51 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् ॥
कर्मजम् फलम्
कर्म से उत्पन्न फल को
त्यक्त्वा
छोड़कर
बुद्धियुक्ताः
बुद्धि-युक्त
मनीषिणः
मनीषी, ज्ञानी
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः
जन्म-बंधन से मुक्त
पदम् गच्छन्ति
पद/स्थान को जाते हैं
अनामयम्
दुःख-रहित, निरामय

कृष्ण बताते हैं — बुद्धि-युक्त मनीषी कर्म से उत्पन्न फल को छोड़कर जन्म-बंधन से मुक्त होकर उस स्थान को जाते हैं जो दुःख-रहित है। यह मोक्ष का सरल और सुंदर वर्णन है।

'अनामयम् पदम्' — जो स्थान दुःख से रहित है। यह स्वर्ग नहीं है जहाँ पुण्य क्षीण होने पर वापसी हो। यह वह अवस्था है जहाँ से लौटना नहीं — जहाँ जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त होता है।

भगवद्गीता में यह श्लोक कर्मयोग का परम फल बताता है। 2.47 में बताया — फल की इच्छा मत रखो। 2.51 में बताया — ऐसा करने वाले का परम फल क्या है।

यह निष्काम कर्म की पूरी यात्रा का चित्र है — कर्म करो, फल छोड़ो, और धीरे-धीरे जन्म-बंधन से मुक्त होते जाओ।

अध्याय 2 · 51 / 72
अध्याय 2 · 51 / 72 अगला →