📿 श्लोक संग्रह

यदा ते मोहकलिलम्

गीता 2.52 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥
यदा
जब
ते बुद्धिः
तुम्हारी बुद्धि
मोहकलिलम्
मोह के दलदल को
व्यतितरिष्यति
पार कर जाएगी
तदा
तब
निर्वेदम् गन्तासि
वैराग्य को प्राप्त होगे
श्रोतव्यस्य
जो सुना जाना चाहिए उससे
श्रुतस्य च
और जो सुन लिया उससे भी

कृष्ण कहते हैं — जब तुम्हारी बुद्धि मोह के दलदल को पार कर जाएगी, तब तुम्हें जो सुना जाना चाहिए और जो सुन लिया है — उन दोनों से वैराग्य होगा। 'मोहकलिलम्' — मोह का दलदल — बहुत सटीक उपमा है।

यह वैराग्य संन्यास नहीं है। यह वह स्थिति है जहाँ बाहरी चीज़ों की आसक्ति कम होती है और भीतरी स्पष्टता बढ़ती है। जैसे धुंध छँटने पर रास्ता दिखता है — वैसे ही मोह हटने पर बुद्धि स्पष्ट होती है।

भगवद्गीता में यह श्लोक ज्ञान की प्रक्रिया को दर्शाता है। पहले मोह हटता है, फिर बाह्य आसक्ति कम होती है, फिर समाधि की स्थिति आती है।

'श्रुतस्य' — जो पहले से सुना है उससे वैराग्य — यह बताता है कि ज्ञान होने पर शास्त्र के प्रति भी मोह नहीं रहता।

अध्याय 2 · 52 / 72
अध्याय 2 · 52 / 72 अगला →