📿 श्लोक संग्रह

भीष्मद्रोणप्रमुखतः

गीता 1.25 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति ॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः
भीष्म और द्रोण के सामने
सर्वेषाम्
सभी के
और
महीक्षिताम्
राजाओं के
उवाच
बोले
पार्थ
हे पृथापुत्र (अर्जुन)
पश्य
देखो
एतान्
इन सबको
समवेतान्
एकत्र हुए
कुरून्
कुरुवंशियों को

कृष्ण ने रथ को भीष्म, द्रोण और सभी राजाओं के सामने लाकर खड़ा कर दिया। फिर उन्होंने अर्जुन से कहा — "हे पार्थ! देखो, यहाँ एकत्र हुए इन कुरुवंशियों को देखो।"

कृष्ण का यह कहना बड़ा अर्थपूर्ण है। वे केवल 'शत्रु' नहीं कहते, बल्कि 'कुरु' कहते हैं — अर्थात तुम्हारे अपने कुल के लोग। कुछ विद्वान मानते हैं कि कृष्ण जानबूझकर यह शब्द चुनते हैं ताकि अर्जुन को वास्तविकता दिखे कि यह कोई बाहरी शत्रु से युद्ध नहीं, अपने ही परिवार से संघर्ष है।

रथ को भीष्म और द्रोण के ठीक सामने खड़ा करने का भी गहरा अर्थ है — ये दोनों अर्जुन के सबसे श्रद्धेय गुरु और पितामह हैं। कृष्ण मानो अर्जुन की परीक्षा ले रहे हैं — या शायद उन्हें उस अनुभव से गुज़ारना चाहते हैं जो आगे चलकर ज्ञान का द्वार खोलेगा।

यह श्लोक पिछले श्लोक (1.24) का ही दूसरा भाग है — दोनों मिलकर एक पूर्ण वर्णन बनाते हैं। कृष्ण ने रथ खड़ा किया और अर्जुन से 'देखो' कहा। यह 'देखना' ही अर्जुन के विषाद का कारण बनेगा।

कृष्ण का 'कुरून्' (कुरुवंशी) शब्द प्रयोग करना — न कि 'शत्रू' — कथा में एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण संकेत है।

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