अपने सभी बंधु-बांधवों को दोनों ओर खड़ा देखकर कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यंत गहरी करुणा से भर गए और शोक में डूबकर बोले। यह वह क्षण है जहाँ गीता के पहले अध्याय का नाम — 'अर्जुनविषादयोग' — सार्थक होता है।
'कृपया परया आविष्टः' — इसका अर्थ है कि अर्जुन के मन में क्रोध या भय नहीं, बल्कि गहरी करुणा उमड़ आई। जैसे कोई माँ अपने बच्चों को आपस में लड़ता देख दुखी हो जाती है, वैसे ही अर्जुन का हृदय अपनों को शत्रु के रूप में देखकर पिघल गया।
यहाँ से अर्जुन का प्रसिद्ध विषाद-भाषण शुरू होता है जिसमें वे एक-एक करके अपनी पीड़ा, अपनी दुविधा और अपनी असमर्थता व्यक्त करेंगे। यही विषाद आगे कृष्ण के दिव्य उपदेश का द्वार खोलेगा।