अर्जुन कृष्ण से कहते हैं — "हे कृष्ण! अपने ही लोगों को युद्ध के लिए तैयार खड़ा देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मेरा मुँह सूख रहा है।" यह अर्जुन के विषाद-भाषण का पहला वाक्य है।
ध्यान दें कि अर्जुन अब 'शत्रु' नहीं कहते, बल्कि 'स्वजन' (अपने लोग) कहते हैं। कुछ क्षण पहले ये सब 'दुर्बुद्धि दुर्योधन के साथी' थे — अब 'अपने' हो गए। यही भावनात्मक बदलाव अर्जुन के विषाद का मूल है।
शरीर के ये लक्षण — अंगों का ढीला पड़ना, मुँह का सूखना — ये गहरे मानसिक तनाव की स्वाभाविक प्रतिक्रिया हैं। जब कोई व्यक्ति बहुत बड़े दुख या आघात से गुज़रता है तो उसका शरीर ऐसा ही व्यवहार करता है।