📿 श्लोक संग्रह

न काङ्क्षे विजयं कृष्ण

गीता 1.32 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥
नहीं
काङ्क्षे
चाहता हूँ
विजयम्
विजय को
कृष्ण
हे कृष्ण
राज्यम्
राज्य को
सुखानि
सुखों को
किम्
क्या (करेंगे)
नः
हम
गोविन्द
हे कृष्ण
भोगैः
भोगों से
जीवितेन
जीवन से

अर्जुन कहते हैं — "हे कृष्ण! मुझे न विजय चाहिए, न राज्य चाहिए, न सुख चाहिए। हे गोविन्द! हमें राज्य से क्या करना, भोगों से क्या करना, या फिर जीवन से ही क्या करना?" यह अर्जुन के विषाद की चरम अभिव्यक्ति है।

सोचिए — जिस राज्य के लिए पांडवों ने तेरह वर्ष वनवास काटा, जिस न्याय के लिए कृष्ण ने स्वयं दूत बनकर संधि का प्रस्ताव रखा — उसी राज्य को अर्जुन अब ठुकरा रहे हैं। क्यों? क्योंकि उस राज्य की क़ीमत अपनों का रक्त है।

'गोविन्द' नाम से अर्जुन कृष्ण को पुकारते हैं — गोविन्द अर्थात गायों और इन्द्रियों के पालक। इस कठिन क्षण में अर्जुन अनजाने में उसी ईश्वर को पुकार रहे हैं जो सबका पालन करता है — मानो कह रहे हों कि 'हे प्रभु, तुम सबकी रक्षा करने वाले हो, अब मेरी भी रक्षा करो इस दुविधा से।'

यह श्लोक अर्जुन की मूल दुविधा को सारगर्भित रूप में प्रस्तुत करता है — जिनके लिए सब कुछ चाहा था, वे ही मरने वाले हैं तो पाकर भी क्या करेंगे? यह प्रश्न आगे के श्लोकों में और गहरा होता जाएगा।

परंपरा में इस प्रकार के विषाद को 'वैराग्य' का प्रारंभिक रूप माना जाता है — हालाँकि कृष्ण बाद में स्पष्ट करेंगे कि यह सच्चा वैराग्य नहीं, बल्कि मोह-जनित दुख है। सच्चा वैराग्य ज्ञान से आता है, भय या शोक से नहीं।

अध्याय 1 · 32 / 47
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