अर्जुन कहते हैं — हे केशव, मुझे चारों ओर अशुभ संकेत दिखाई दे रहे हैं। जैसे कोई यात्री रास्ते में बुरे शकुन देखकर रुक जाता है, वैसे ही अर्जुन का मन कह रहा है कि इस युद्ध से कुछ अच्छा नहीं होगा।
वे आगे कहते हैं कि अपने ही लोगों को मारकर युद्ध में कोई भलाई नहीं दिखती। जीत भी मिल जाए तो वह खुशी नहीं ला सकती, क्योंकि खुशी मनाने वाले अपने लोग ही तो नहीं रहेंगे।
यह श्लोक दिखाता है कि अर्जुन का विषाद अब गहरा हो चुका है — वे तर्क और भावना दोनों से युद्ध के विरुद्ध खड़े हैं।