📿 श्लोक संग्रह

न काङ्क्षे विजयं कृष्ण

गीता 1.34 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ॥
नहीं
काङ्क्षे
चाहता हूँ
विजयम्
विजय को
कृष्ण
हे कृष्ण
राज्यम्
राज्य को
सुखानि
सुखों को
किम्
क्या (करेंगे)
नः
हमें
गोविन्द
हे गोविन्द
भोगैः
भोगों से
जीवितेन
जीवन से

अर्जुन कृष्ण से कहते हैं — मुझे न विजय चाहिए, न राज्य, न सुख। यह ऐसे ही है जैसे कोई व्यक्ति कहे कि भरा-पूरा भोजन रख दो, पर साथ खाने वाले अपने लोग न हों तो उस भोजन का क्या मोल?

अर्जुन आगे पूछते हैं — हे गोविन्द, राज्य से क्या होगा? भोगों से क्या होगा? यहाँ तक कि जीवन से भी क्या होगा? यह प्रश्न दिखाता है कि अर्जुन का मन इतना विचलित हो चुका है कि उन्हें सांसारिक सुख बिलकुल व्यर्थ लग रहे हैं।

यह वैराग्य नहीं, विषाद है — क्योंकि यह ज्ञान से नहीं, दुख और भ्रम से उपजा है। आगे कृष्ण इसी भ्रम को दूर करेंगे।

यह श्लोक अर्जुनविषादयोग का महत्वपूर्ण भाग है। अर्जुन जो पहले महान धनुर्धर के रूप में जाने जाते थे, अब युद्धभूमि में खड़े होकर सब कुछ त्याग देने की बात कर रहे हैं।

परम्परा में इस श्लोक को मोह-जनित वैराग्य का उदाहरण माना जाता है — जहाँ व्यक्ति कर्तव्य से नहीं, भावना के वशीभूत होकर त्याग की बात करता है।

अध्याय 1 · 34 / 47
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