सञ्जय धृतराष्ट्र से कहते हैं — इस प्रकार कहकर अर्जुन ने युद्धभूमि में अपने बाणों सहित धनुष को छोड़ दिया और शोक से व्याकुल मन लिए रथ की पिछली बैठक पर बैठ गए।
यह दृश्य बहुत मार्मिक है। कल्पना कीजिए — कुरुक्षेत्र की विशाल रणभूमि, दोनों ओर लाखों सैनिक, शंख और नगाड़े गूँज रहे हैं — और बीच में महान धनुर्धर अर्जुन अपना गाण्डीव धनुष नीचे रखकर रथ में बैठ जाते हैं, आँखों में आँसू और मन में गहरा दुख।
'शोकसंविग्नमानसः' — शोक से विह्वल मन — यह एक शब्द पूरे प्रथम अध्याय का सार है। अर्जुन का विषाद यहाँ अपने चरम पर पहुँच गया है। यहीं से दूसरे अध्याय में कृष्ण के उपदेश का मार्ग खुलता है।