📿 श्लोक संग्रह

यदि मामप्रतीकारम्

गीता 1.46 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥
यदि
यदि / अगर
माम्
मुझको
अप्रतीकारम्
बिना प्रतिकार किए
अशस्त्रम्
निहत्थे / शस्त्रहीन
शस्त्रपाणयः
हाथ में शस्त्र लिए हुए
धार्तराष्ट्राः
धृतराष्ट्र के पुत्र
रणे
युद्धभूमि में
हन्युः
मार दें
तत्
वह
मे
मेरे लिए
क्षेमतरम्
अधिक कल्याणकारी
भवेत्
होगा

अर्जुन कहते हैं — अगर धृतराष्ट्र के पुत्र हाथ में शस्त्र लिए हुए मुझ निहत्थे और बिना प्रतिकार किए को युद्धभूमि में मार भी दें, तो भी वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा।

यह अर्जुन के विषाद की चरम अवस्था है। एक ऐसा योद्धा जिसने अनगिनत युद्ध जीते हैं, जिसके पास गाण्डीव जैसा अद्भुत धनुष है — वह कह रहा है कि मर जाना बेहतर है, लेकिन अपनों को मारना सम्भव नहीं।

जैसे कोई माँ कहे कि मैं स्वयं कष्ट सह लूँगी लेकिन अपने बच्चों को कष्ट नहीं दूँगी — वैसे ही अर्जुन का प्रेम इतना गहरा है कि वे अपनी मृत्यु को भी स्वीकार कर रहे हैं।

यह श्लोक अर्जुन की अंतिम घोषणा है — इसके बाद अगले श्लोक (1.47) में सञ्जय बताते हैं कि अर्जुन ने शस्त्र रख दिए। 'अप्रतीकारम्' और 'अशस्त्रम्' — ये दो शब्द मिलकर अर्जुन के पूर्ण समर्पण को दर्शाते हैं।

परम्परा में यह श्लोक अहिंसा की चरम अभिव्यक्ति के रूप में भी देखा जाता है — हालाँकि कृष्ण आगे चलकर इसे मोह-जनित भ्रम बताएँगे।

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