अर्जुन कहते हैं — अगर धृतराष्ट्र के पुत्र हाथ में शस्त्र लिए हुए मुझ निहत्थे और बिना प्रतिकार किए को युद्धभूमि में मार भी दें, तो भी वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा।
यह अर्जुन के विषाद की चरम अवस्था है। एक ऐसा योद्धा जिसने अनगिनत युद्ध जीते हैं, जिसके पास गाण्डीव जैसा अद्भुत धनुष है — वह कह रहा है कि मर जाना बेहतर है, लेकिन अपनों को मारना सम्भव नहीं।
जैसे कोई माँ कहे कि मैं स्वयं कष्ट सह लूँगी लेकिन अपने बच्चों को कष्ट नहीं दूँगी — वैसे ही अर्जुन का प्रेम इतना गहरा है कि वे अपनी मृत्यु को भी स्वीकार कर रहे हैं।