अर्जुन विलाप करते हुए कहते हैं — हाय! कितने दुख की बात है कि हम इतना बड़ा पाप करने को तैयार हो गए हैं! राज्य और सुख के लोभ में हम अपने ही लोगों को मारने पर उतारू हैं!
'अहो बत' — यह विस्मय और दुख दोनों का उद्गार है। जैसे कोई व्यक्ति अचानक अपनी भूल का अहसास करे और पुकार उठे — "ये हम क्या कर रहे हैं!" अर्जुन का यह भाव बिलकुल वैसा ही है।
ध्यान दीजिए कि अर्जुन 'वयम्' — हम — कहते हैं, केवल 'मैं' नहीं। वे दोष केवल कौरवों पर नहीं, स्वयं पर भी लगा रहे हैं। वे मानते हैं कि इस पाप में दोनों पक्ष बराबर के भागीदार हैं।