📿 श्लोक संग्रह

अहो बत महत्पापम्

गीता 1.45 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥
अहो बत
हाय! कितने दुख की बात है
महत्
बड़ा
पापम्
पाप
कर्तुम्
करने के लिए
व्यवसिताः
तैयार हैं
वयम्
हम
यत्
कि
राज्यसुखलोभेन
राज्य-सुख के लोभ से
हन्तुम्
मारने के लिए
स्वजनम्
अपने लोगों को
उद्यताः
उद्यत / तत्पर

अर्जुन विलाप करते हुए कहते हैं — हाय! कितने दुख की बात है कि हम इतना बड़ा पाप करने को तैयार हो गए हैं! राज्य और सुख के लोभ में हम अपने ही लोगों को मारने पर उतारू हैं!

'अहो बत' — यह विस्मय और दुख दोनों का उद्गार है। जैसे कोई व्यक्ति अचानक अपनी भूल का अहसास करे और पुकार उठे — "ये हम क्या कर रहे हैं!" अर्जुन का यह भाव बिलकुल वैसा ही है।

ध्यान दीजिए कि अर्जुन 'वयम्' — हम — कहते हैं, केवल 'मैं' नहीं। वे दोष केवल कौरवों पर नहीं, स्वयं पर भी लगा रहे हैं। वे मानते हैं कि इस पाप में दोनों पक्ष बराबर के भागीदार हैं।

यह श्लोक अर्जुन के विषाद का भावनात्मक चरम है। अब तक वे तर्क दे रहे थे, यहाँ वे विलाप कर रहे हैं। तर्क से भावना की ओर — यह बदलाव दिखाता है कि अर्जुन पूरी तरह टूट चुके हैं।

'राज्यसुखलोभ' — राज्य के सुख का लोभ — अर्जुन इसे पूरे युद्ध का मूल कारण मानते हैं। यह वही लोभ है जो पिछले श्लोक (1.38) में कौरवों के लिए कहा गया था, लेकिन अब अर्जुन इसे अपने ऊपर भी लागू कर रहे हैं।

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