और वहाँ अर्जुन ने क्या देखा? दोनों सेनाओं में खड़े अपने ही लोगों को — चाचाओं को, दादाओं को, गुरुओं को, मामाओं को, भाइयों को, बेटों को, पोतों को और मित्रों को। हर तरफ़ जिधर नज़र गई, कोई न कोई अपना ही दिखा।
यह वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति किसी बड़े समारोह में जाए और अचानक पता चले कि जिससे लड़ाई हो रही है, वह उसका अपना ही परिवार है। पिता-तुल्य भीष्म पितामह सामने खड़े हैं, गुरु द्रोणाचार्य — जिन्होंने धनुष चलाना सिखाया — वे भी सामने हैं। मामा शल्य, भाई-बंधु, बचपन के साथी — सब शत्रु पक्ष में।
इस एक दृश्य ने अर्जुन के भीतर सब कुछ बदल दिया। जो योद्धा अभी तक शत्रुओं को 'देखने' निकला था, उसे अब 'अपने' दिख रहे हैं।