अब संजय बोलते हैं — "हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अर्जुन के ऐसा कहने पर भगवान कृष्ण ने उस श्रेष्ठ रथ को दोनों सेनाओं के बीच में लाकर खड़ा कर दिया।"
यहाँ दो सुंदर नाम आए हैं — 'हृषीकेश' अर्थात इन्द्रियों के स्वामी (कृष्ण), और 'गुडाकेश' अर्थात निद्रा को जीतने वाला (अर्जुन)। ये नाम बताते हैं कि रथ में दो असाधारण व्यक्ति बैठे हैं — एक जो सम्पूर्ण सृष्टि की इन्द्रियों को नियंत्रित करते हैं, और दूसरा जो अपनी निद्रा तक पर विजय पा चुका है।
कृष्ण बिना एक शब्द कहे अर्जुन की बात मान लेते हैं। सच्चे मित्र और सच्चे सारथी का यही धर्म है — सखा की इच्छा पूरी करना। लेकिन कृष्ण जानते हैं कि इस 'देखने' से क्या होने वाला है।