📿 श्लोक संग्रह

एवमुक्तो हृषीकेशो

गीता 1.24 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 1 — अर्जुनविषादयोग
सञ्जय उवाच — एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥
सञ्जय उवाच
संजय ने कहा
एवम्
इस प्रकार
उक्तः
कहे जाने पर
हृषीकेशः
कृष्ण (इन्द्रियों के स्वामी)
गुडाकेशेन
अर्जुन द्वारा (निद्रा को जीतने वाला)
भारत
हे भरतवंशी (धृतराष्ट्र)
सेनयोः उभयोः
दोनों सेनाओं के
मध्ये
बीच में
स्थापयित्वा
खड़ा करके
रथोत्तमम्
उत्तम रथ को

अब संजय बोलते हैं — "हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अर्जुन के ऐसा कहने पर भगवान कृष्ण ने उस श्रेष्ठ रथ को दोनों सेनाओं के बीच में लाकर खड़ा कर दिया।"

यहाँ दो सुंदर नाम आए हैं — 'हृषीकेश' अर्थात इन्द्रियों के स्वामी (कृष्ण), और 'गुडाकेश' अर्थात निद्रा को जीतने वाला (अर्जुन)। ये नाम बताते हैं कि रथ में दो असाधारण व्यक्ति बैठे हैं — एक जो सम्पूर्ण सृष्टि की इन्द्रियों को नियंत्रित करते हैं, और दूसरा जो अपनी निद्रा तक पर विजय पा चुका है।

कृष्ण बिना एक शब्द कहे अर्जुन की बात मान लेते हैं। सच्चे मित्र और सच्चे सारथी का यही धर्म है — सखा की इच्छा पूरी करना। लेकिन कृष्ण जानते हैं कि इस 'देखने' से क्या होने वाला है।

संजय यहाँ 'भारत' कहकर धृतराष्ट्र को संबोधित करते हैं — यह याद दिलाना है कि वे भी उसी महान भरत वंश के हैं जिसमें पांडव और कौरव दोनों जन्मे। रथ को बीच में ले जाना — यह एक सामान्य-सी बात लगती है, लेकिन यही वह क्षण है जहाँ से गीता का असली उपदेश जन्म लेगा।

अध्याय 1 · 24 / 47
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