अर्जुन कहते हैं — "गाण्डीव धनुष मेरे हाथ से गिर रहा है, त्वचा में जलन हो रही है, मैं खड़ा भी नहीं रह पा रहा और मेरा मन चक्कर खा रहा है।" वह गाण्डीव जो अर्जुन की पहचान था, जिसे उठाने की शक्ति तीनों लोकों में किसी और में नहीं थी — वही धनुष अब उनके हाथ से फिसल रहा है।
गाण्डीव का गिरना केवल शारीरिक कमज़ोरी नहीं, बल्कि अर्जुन के संकल्प के टूटने का प्रतीक है। एक योद्धा का हथियार उसकी आत्मा का विस्तार होता है — जब आत्मा टूटती है तो हथियार भी साथ छोड़ देता है।
'भ्रमतीव च मे मनः' — मन घूम रहा है, जैसे चक्कर आ रहे हों। यह सबसे गंभीर लक्षण है — शरीर तो कमज़ोर था ही, अब मन भी साथ नहीं दे रहा। अर्जुन पूरी तरह विवश हो गए हैं।