अर्जुन कहते हैं — "मैं उन लोगों को देखना चाहता हूँ जो दुर्बुद्धि दुर्योधन का भला चाहकर यहाँ युद्ध के लिए आए हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि कौन-कौन उसके पक्ष में खड़ा है।"
ध्यान दीजिए — अर्जुन दुर्योधन को 'दुर्बुद्धि' कहते हैं। इसका अर्थ है कि अर्जुन के मन में अभी क्रोध और दृढ़ता दोनों हैं। वे स्पष्ट रूप से मानते हैं कि दुर्योधन ग़लत है और जो उसका साथ दे रहे हैं, वे भी ग़लत पक्ष में हैं।
लेकिन यही अर्जुन कुछ ही क्षणों बाद जब उन 'शत्रुओं' के चेहरे पहचानेंगे — अपने गुरु द्रोण, पितामह भीष्म, मामा शल्य — तब 'दुर्बुद्धि के साथी' अचानक 'अपने लोग' बन जाएँगे और उनका सारा संकल्प बिखर जाएगा।