अर्जुन अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहते हैं — "मैं देखना चाहता हूँ कि इस युद्ध में मुझे किन-किन के साथ लड़ना है। जो लोग युद्ध की इच्छा से यहाँ आकर खड़े हुए हैं, उन सबको मैं ठीक से देख लेना चाहता हूँ।"
अभी तक अर्जुन के मन में कोई संशय नहीं है। वे एक कुशल योद्धा की तरह सोच रहे हैं — पहले शत्रु को पहचानो, फिर रणनीति बनाओ। यह वैसा ही है जैसे कोई खिलाड़ी मैच से पहले विरोधी टीम के खिलाड़ियों को जानना चाहता है।
लेकिन जो अर्जुन अभी 'शत्रुओं' को देखने निकले हैं, वे जल्दी ही वहाँ शत्रु नहीं, अपने ही गुरु, दादा, मामा और भाई देखेंगे — और तब सब बदल जाएगा।