📿 श्लोक संग्रह

पुरुषः स परः पार्थ

गीता 8.22 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥
पुरुषः सः परः
वह परम पुरुष
पार्थ
हे पार्थ
भक्त्या
भक्ति से
लभ्यः
प्राप्त किया जा सकता है
तु
लेकिन
अनन्यया
अनन्य (एकनिष्ठ)
यस्य अन्तःस्थानि
जिसके भीतर स्थित हैं
भूतानि
सभी प्राणी
येन
जिसके द्वारा
सर्वम् इदम्
यह सब कुछ
ततम्
व्याप्त है

कृष्ण कहते हैं — हे पार्थ, वह परम पुरुष — जिसके भीतर सारे प्राणी स्थित हैं, जिसने इस सम्पूर्ण जगत को व्याप्त किया है — वह केवल अनन्य भक्ति से प्राप्त होता है।

"अनन्य भक्ति" — अर्थात जिसमें कोई और सहारा न हो, बस एक भगवान ही सहारा हों। जैसे छोटा बच्चा सिर्फ़ माँ को पकड़कर चलता है — उसे किसी और की ज़रूरत नहीं — वैसे ही अनन्य भक्त सिर्फ़ भगवान पर निर्भर रहता है।

और वह परम पुरुष कैसा है? जिसमें सब कुछ समाया हुआ है, और जो सब कुछ में फैला हुआ है। जैसे समुद्र में सारी लहरें हैं और लहरों में समुद्र है — वैसे ही भगवान में सारा जगत है और जगत में भगवान हैं।

यह श्लोक गीता के भक्ति-मार्ग का सार है। कृष्ण बार-बार भक्ति पर बल देते हैं — 8.10 में "भक्त्या युक्तः", 8.14 में "अनन्यचेताः", और 8.22 में "भक्त्या अनन्यया"।

यही भाव गीता 9.22 में भी मिलता है — "अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते" — जो अनन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं, उनका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।

अध्याय 8 · 22 / 28
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