कृष्ण कहते हैं — हे पार्थ, वह परम पुरुष — जिसके भीतर सारे प्राणी स्थित हैं, जिसने इस सम्पूर्ण जगत को व्याप्त किया है — वह केवल अनन्य भक्ति से प्राप्त होता है।
"अनन्य भक्ति" — अर्थात जिसमें कोई और सहारा न हो, बस एक भगवान ही सहारा हों। जैसे छोटा बच्चा सिर्फ़ माँ को पकड़कर चलता है — उसे किसी और की ज़रूरत नहीं — वैसे ही अनन्य भक्त सिर्फ़ भगवान पर निर्भर रहता है।
और वह परम पुरुष कैसा है? जिसमें सब कुछ समाया हुआ है, और जो सब कुछ में फैला हुआ है। जैसे समुद्र में सारी लहरें हैं और लहरों में समुद्र है — वैसे ही भगवान में सारा जगत है और जगत में भगवान हैं।