📿 श्लोक संग्रह

यत्र काले त्वनावृत्तिम्

गीता 8.23 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥
यत्र काले
जिस काल में
तु
तो
अनावृत्तिम्
न लौटना (मोक्ष)
आवृत्तिम्
लौटना (पुनर्जन्म)
च एव
और भी
योगिनः
योगी लोग
प्रयाताः
शरीर छोड़कर गए
यान्ति
जाते हैं
तम् कालम्
उस काल को
वक्ष्यामि
बताऊँगा
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ

कृष्ण कहते हैं — हे भरतश्रेष्ठ, अब मैं तुम्हें वह काल (समय) बताता हूँ जिसमें शरीर छोड़ने वाले योगी लौटते नहीं (मोक्ष पाते हैं) और जिसमें लौटते हैं (पुनर्जन्म लेते हैं)।

यह एक नए विषय की भूमिका है। अब तक कृष्ण ने बताया कि क्या स्मरण करें (8.5-8.14) और कहाँ पहुँचें (8.15-8.22)। अब वे बता रहे हैं कि शरीर छोड़ने का समय भी गति (मोक्ष या पुनर्जन्म) को प्रभावित करता है।

अगले दो श्लोकों (8.24-8.25) में दो मार्गों — शुक्ल गति (प्रकाश का मार्ग) और कृष्ण गति (अंधकार का मार्ग) — का वर्णन होगा।

शुक्ल गति और कृष्ण गति की चर्चा छान्दोग्य उपनिषद (5.10) और बृहदारण्यक उपनिषद (6.2) में भी मिलती है। कृष्ण उसी प्राचीन ज्ञान को यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

यह ध्यान रखना चाहिए कि गीता 8.27 में कृष्ण स्वयं कहते हैं कि योगी इन दोनों मार्गों को जानकर भी मोहित नहीं होता — अर्थात अंतिम रूप से भक्ति ही सर्वोपरि है।

अध्याय 8 · 23 / 28
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