कृष्ण "शुक्ल गति" — प्रकाश का मार्ग — बता रहे हैं। अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष, और उत्तरायण के छः मास — यह प्रकाश का मार्ग है। इस काल में शरीर छोड़ने वाले ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
उपनिषदों में इसे "देवयान मार्ग" कहा गया है — देवताओं का मार्ग। जैसे सूर्योदय के साथ सब कुछ प्रकाशित हो जाता है, वैसे ही यह प्रकाश का मार्ग ज्ञान और मुक्ति की ओर ले जाता है।
परंपरा में माना जाता है कि भीष्म पितामह ने भी उत्तरायण की प्रतीक्षा करके शरीर छोड़ा था — यह इसी सिद्धांत के अनुसार है।