📿 श्लोक संग्रह

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः

गीता 8.24 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥
अग्निः
अग्नि (प्रकाश)
ज्योतिः
ज्योति
अहः
दिन
शुक्लः
शुक्ल पक्ष
षण्मासाः
छः मास
उत्तरायणम्
उत्तरायण (सूर्य उत्तर की ओर)
तत्र प्रयाताः
उसमें शरीर छोड़ने वाले
गच्छन्ति
जाते हैं
ब्रह्म
ब्रह्म को
ब्रह्मविदः जनाः
ब्रह्म को जानने वाले लोग

कृष्ण "शुक्ल गति" — प्रकाश का मार्ग — बता रहे हैं। अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष, और उत्तरायण के छः मास — यह प्रकाश का मार्ग है। इस काल में शरीर छोड़ने वाले ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

उपनिषदों में इसे "देवयान मार्ग" कहा गया है — देवताओं का मार्ग। जैसे सूर्योदय के साथ सब कुछ प्रकाशित हो जाता है, वैसे ही यह प्रकाश का मार्ग ज्ञान और मुक्ति की ओर ले जाता है।

परंपरा में माना जाता है कि भीष्म पितामह ने भी उत्तरायण की प्रतीक्षा करके शरीर छोड़ा था — यह इसी सिद्धांत के अनुसार है।

छान्दोग्य उपनिषद (5.10.1-2) में देवयान और पितृयान मार्गों का विस्तृत वर्णन मिलता है। गीता उसी ज्ञान को यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत करती है।

अगला श्लोक (8.25) इसके विपरीत "कृष्ण गति" — अंधकार का मार्ग — बताता है, जिसमें जीव लौटकर फिर जन्म लेता है।

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