कृष्ण सारांश देते हैं — शुक्ल गति (प्रकाश का मार्ग) और कृष्ण गति (अंधकार का मार्ग) — ये दो गतियाँ जगत में सनातन (शाश्वत) मानी गई हैं। शुक्ल गति से जाने वाला लौटता नहीं (मोक्ष पाता है), कृष्ण गति से जाने वाला फिर लौट आता है (पुनर्जन्म लेता है)।
इसे ऐसे समझें — जैसे किसी चौराहे पर दो रास्ते हों: एक रास्ता घर की ओर ले जाता है (जहाँ से लौटना नहीं पड़ता), दूसरा बाज़ार की ओर (जहाँ से खरीदारी करके लौटना ही पड़ता है)। ज्ञानी पहला रास्ता चुनता है।
ये दोनों मार्ग सनातन हैं — सदा से चले आ रहे हैं। पर कृष्ण अगले श्लोक में कहेंगे कि जो योगी इन दोनों को जानता है, वह मोहित नहीं होता।