📿 श्लोक संग्रह

शुक्लकृष्णे गती ह्येते

गीता 8.26 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 8 — अक्षरब्रह्मयोग
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥
शुक्लकृष्णे
शुक्ल और कृष्ण
गती
दो गतियाँ (मार्ग)
हि एते
निश्चय ही ये
जगतः
संसार की
शाश्वते
शाश्वत (सनातन)
मते
मानी गई हैं
एकया
एक से
याति अनावृत्तिम्
अनावृत्ति (मोक्ष) पाता है
अन्यया
दूसरी से
आवर्तते पुनः
फिर लौटता है

कृष्ण सारांश देते हैं — शुक्ल गति (प्रकाश का मार्ग) और कृष्ण गति (अंधकार का मार्ग) — ये दो गतियाँ जगत में सनातन (शाश्वत) मानी गई हैं। शुक्ल गति से जाने वाला लौटता नहीं (मोक्ष पाता है), कृष्ण गति से जाने वाला फिर लौट आता है (पुनर्जन्म लेता है)।

इसे ऐसे समझें — जैसे किसी चौराहे पर दो रास्ते हों: एक रास्ता घर की ओर ले जाता है (जहाँ से लौटना नहीं पड़ता), दूसरा बाज़ार की ओर (जहाँ से खरीदारी करके लौटना ही पड़ता है)। ज्ञानी पहला रास्ता चुनता है।

ये दोनों मार्ग सनातन हैं — सदा से चले आ रहे हैं। पर कृष्ण अगले श्लोक में कहेंगे कि जो योगी इन दोनों को जानता है, वह मोहित नहीं होता।

यह श्लोक 8.24-8.25 का सारांश है। दोनों गतियों को "शाश्वते" कहा गया है — ये प्रकृति के नियम हैं, सदा से हैं।

अगला श्लोक (8.27) इस विषय का उपसंहार करता है — योगी को इन मार्गों का ज्ञान होने पर भी भ्रम नहीं होता, वह सदा योग में स्थित रहता है।

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