📿 श्लोक संग्रह

तद्बुद्धयस्तदात्मानः

गीता 5.17 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥
तद्बुद्धयः
उस (परमात्मा) में बुद्धि लगाने वाले
तदात्मानः
उसमें मन लगाने वाले
तन्निष्ठाः
उसमें निष्ठा रखने वाले
तत्परायणाः
उसे ही परम आश्रय मानने वाले
गच्छन्ति
जाते हैं
अपुनरावृत्तिम्
जहाँ से लौटना नहीं होता
ज्ञाननिर्धूत
ज्ञान से धुले हुए
कल्मषाः
पाप जिनके

जिनकी बुद्धि, मन, निष्ठा और परम आश्रय — सब परमात्मा में है — वे ज्ञान से अपने पापों को धोकर उस स्थान को पाते हैं जहाँ से लौटना नहीं होता।

जैसे नदी एक बार समुद्र में मिल जाए तो वह नदी नहीं रहती — समुद्र ही हो जाती है। ऐसे ही जो पूरी तरह परमात्मा में लीन हो जाते हैं, वे संसार के चक्र से बाहर हो जाते हैं।

यह श्लोक ज्ञानयोग की परिणति को दर्शाता है। 'अपुनरावृत्तिम्' — जहाँ से लौटना न हो — यह मोक्ष का संकेत है।

परंपरा में 'ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः' पद को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है — ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, यह पापों का शोधक भी है।

अध्याय 5 · 17 / 29
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