जिनकी बुद्धि, मन, निष्ठा और परम आश्रय — सब परमात्मा में है — वे ज्ञान से अपने पापों को धोकर उस स्थान को पाते हैं जहाँ से लौटना नहीं होता।
जैसे नदी एक बार समुद्र में मिल जाए तो वह नदी नहीं रहती — समुद्र ही हो जाती है। ऐसे ही जो पूरी तरह परमात्मा में लीन हो जाते हैं, वे संसार के चक्र से बाहर हो जाते हैं।