इस श्लोक में बड़ी गहरी बात कही गई है। ज्ञानी व्यक्ति एक विद्वान ब्राह्मण में, एक गाय में, एक विशाल हाथी में, एक छोटे कुत्ते में और एक चाण्डाल (समाज में सबसे नीचे माने जाने वाले व्यक्ति) में — सबमें एक ही आत्मा देखता है।
बाहर से सब अलग-अलग दिखते हैं — कोई बड़ा, कोई छोटा, कोई सम्मानित, कोई उपेक्षित। लेकिन भीतर सबमें वही एक आत्मा है। जैसे अलग-अलग बर्तनों में रखा पानी एक ही होता है — चाहे सोने के बर्तन में हो या मिट्टी के — वैसे ही अलग-अलग शरीरों में बसी आत्मा एक ही है।
यह श्लोक समानता की सबसे ऊँची शिक्षा है। जब कोई सचमुच सबमें एक ही आत्मा देखने लगे, तो फिर ऊँच-नीच, भेदभाव अपने-आप समाप्त हो जाते हैं।