📿 श्लोक संग्रह

इहैव तैर्जितः सर्गः

गीता 5.19 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥
इह एव
यहीं, इसी जीवन में
तैः
उनके द्वारा
जितः
जीत लिया गया
सर्गः
संसार, जन्म-मृत्यु का चक्र
येषाम्
जिनका
साम्ये
समभाव में
स्थितम्
स्थित है
मनः
मन
निर्दोषम्
निर्दोष, निर्मल
हि
निश्चय ही
समम्
सब में सम
ब्रह्म
ब्रह्म
तस्मात्
इसलिए
ब्रह्मणि
ब्रह्म में
ते स्थिताः
वे स्थित हैं

कृष्ण कहते हैं — जिनका मन समभाव में स्थित है, उन्होंने इसी जीवन में संसार को जीत लिया। क्योंकि ब्रह्म निर्दोष है, सबमें सम है — और ऐसे लोग ब्रह्म में ही स्थित हैं।

जैसे तराज़ू दोनों तरफ़ बराबर हो तो वह संतुलित कहलाता है। जिसका मन सुख-दुख, मान-अपमान में बराबर रहे — वह इसी धरती पर मुक्त है। आगे का चक्र उसे नहीं बाँधता।

यह श्लोक 5.18 (समदर्शन) के बाद आता है। वहाँ बताया कि ज्ञानी सबमें एक ही देखता है — यहाँ उसका फल बताया गया।

परंपरा में 'इहैव' — यहीं, इसी जन्म में — पद को विशेष महत्व दिया गया है। मोक्ष मृत्यु के बाद नहीं, जीवित रहते ही संभव है।

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