📿 श्लोक संग्रह

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य

गीता 5.20 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥
न प्रहृष्येत्
प्रसन्नता से न उछले
प्रियम्
प्रिय वस्तु
प्राप्य
पाकर
न उद्विजेत्
घबराए नहीं
प्राप्य च अप्रियम्
अप्रिय पाकर भी
स्थिरबुद्धिः
स्थिर बुद्धि वाला
असम्मूढः
मोहरहित
ब्रह्मवित्
ब्रह्म को जानने वाला
ब्रह्मणि
ब्रह्म में
स्थितः
स्थित है

कृष्ण कहते हैं — ब्रह्म को जानने वाला प्रिय मिलने पर उछलता नहीं, और अप्रिय मिलने पर घबराता नहीं। उसकी बुद्धि स्थिर है, मोह नहीं है — वह ब्रह्म में टिका है।

जैसे एक पुराना पेड़ — चाहे तेज़ आँधी आए, चाहे बारिश हो या धूप — वह जड़ से हिलता नहीं। ब्रह्मज्ञानी की स्थिति ऐसी ही होती है। अच्छे-बुरे दोनों उसे हिला नहीं पाते।

यह श्लोक 'स्थितप्रज्ञ' के लक्षणों से मिलता-जुलता है जो दूसरे अध्याय में बताए गए थे। पाँचवें अध्याय में यही गुण ब्रह्मज्ञानी के रूप में प्रस्तुत होते हैं।

परंपरा में यह माना गया है कि ब्रह्म में स्थिति का अर्थ निष्क्रियता नहीं — बल्कि भीतरी समभाव के साथ सक्रिय जीवन जीना है।

अध्याय 5 · 20 / 29
अध्याय 5 · 20 / 29 अगला →