📿 श्लोक संग्रह

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा

गीता 5.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 5 — कर्मसंन्यासयोग
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥
बाह्यस्पर्शेषु
बाहरी विषयों के स्पर्शों में
असक्तात्मा
अनासक्त मन वाला
विन्दति
पाता है
आत्मनि
आत्मा में, भीतर
यत् सुखम्
जो सुख है
सः
वह
ब्रह्मयोगयुक्तात्मा
ब्रह्मयोग में जुड़ा हुआ
सुखम्
सुख
अक्षयम्
अक्षय, कभी न घटने वाला
अश्नुते
भोगता है, पाता है

जो बाहरी विषयों में आसक्त नहीं है, वह भीतर से आनंद पाता है। ऐसा ब्रह्मयोगी अक्षय — कभी न खत्म होने वाला — सुख पाता है।

जैसे एक दीपक बाहर तेज़ हवा हो तो बुझ जाता है — पर जो दीपक भीतर के कमरे में जले, हवा उसे नहीं बुझा सकती। भीतर का आनंद बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता।

यह श्लोक भीतरी आनंद की बात करता है जो बाहरी सुखों से मिलने वाले आनंद से भिन्न है। 'अक्षयम्' — कभी न घटने वाला — यह शाश्वत सुख का संकेत है।

परंपरा में इस श्लोक को आत्मनिष्ठा और ब्रह्मयोग का व्यावहारिक फल माना गया है।

अध्याय 5 · 21 / 29
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