कृष्ण कहते हैं — इंद्रियों के संपर्क से जो भोग मिलते हैं, वे दुख के ही स्रोत हैं। उनका आदि भी है, अंत भी। ज्ञानी उनमें नहीं रमता।
जैसे मिठाई खाने की इच्छा होती है, मिठाई मिली, खाई, मीठा लगा — पर थोड़ी देर में फिर भूख लगी। सुख क्षणिक था। जो जानता है यह, वह इस चक्र में नहीं फँसता।