भगवान कहते हैं — जो मान और अपमान में समान रहे, मित्र और शत्रु पक्ष में समान भाव रखे, और सब सकाम कर्मों (फल की इच्छा से किए गए कामों) का त्याग कर दे — वह गुणातीत कहलाता है।
यह पिछले श्लोक (14.24) को पूरा करता है। वहाँ सुख-दुःख, निन्दा-स्तुति में समता बताई गई; यहाँ मान-अपमान और मित्र-शत्रु में समता जोड़ी गई।
"सर्वारम्भपरित्यागी" का अर्थ है — फल की कामना से नए-नए काम शुरू करने की प्रवृत्ति का त्याग। ऐसा व्यक्ति कर्म तो करता है, पर "मुझे इससे यह मिलेगा" — यह भावना नहीं रखता।