📿 श्लोक संग्रह

मानापमानयोस्तुल्यः

गीता 14.25 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥
मानापमानयोः
मान-अपमान में
तुल्यः
समान
तुल्यः
समान
मित्रारिपक्षयोः
मित्र और शत्रु पक्ष में
सर्वारम्भपरित्यागी
सब आरम्भों (सकाम कर्मों) का त्यागी
गुणातीतः
गुणों से परे
सः
वह
उच्यते
कहा जाता है

भगवान कहते हैं — जो मान और अपमान में समान रहे, मित्र और शत्रु पक्ष में समान भाव रखे, और सब सकाम कर्मों (फल की इच्छा से किए गए कामों) का त्याग कर दे — वह गुणातीत कहलाता है।

यह पिछले श्लोक (14.24) को पूरा करता है। वहाँ सुख-दुःख, निन्दा-स्तुति में समता बताई गई; यहाँ मान-अपमान और मित्र-शत्रु में समता जोड़ी गई।

"सर्वारम्भपरित्यागी" का अर्थ है — फल की कामना से नए-नए काम शुरू करने की प्रवृत्ति का त्याग। ऐसा व्यक्ति कर्म तो करता है, पर "मुझे इससे यह मिलेगा" — यह भावना नहीं रखता।

"गुणातीतः स उच्यते" — यह इस श्लोक-समूह (14.22-25) का निष्कर्ष वाक्य है। अब अगले श्लोक (14.26) में गुणातीत होने का उपाय बताया जाएगा — यही अर्जुन के तीसरे प्रश्न का उत्तर है।

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