📿 श्लोक संग्रह

मां च योऽव्यभिचारेण

गीता 14.26 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
माम्
मुझको
और
यः
जो
अव्यभिचारेण
अनन्य (एकनिष्ठ)
भक्तियोगेन
भक्तियोग से
सेवते
सेवा करता है
सः
वह
गुणान्
गुणों को
समतीत्य
पूर्णतः पार करके
एतान्
इन
ब्रह्मभूयाय
ब्रह्म-स्वरूप होने के लिए
कल्पते
योग्य होता है

भगवान कहते हैं — जो अनन्य भक्तियोग से मेरी सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को पूर्णतः पार करके ब्रह्म-स्वरूप होने के योग्य हो जाता है।

यह अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक है। अर्जुन ने पूछा था "कैसे गुणों को पार करें?" — इसका उत्तर है: अनन्य भक्ति। "अव्यभिचारेण" का अर्थ है — बिना किसी विचलन के, एकनिष्ठ भाव से।

भगवान यहाँ भक्ति को गुणातीत होने का सबसे सरल और सुनिश्चित उपाय बता रहे हैं। ज्ञान कठिन हो सकता है, योग कठिन हो सकता है, पर भक्ति सबके लिए सुलभ है — बस एकनिष्ठ होनी चाहिए।

यह श्लोक गीता के भक्तियोग के सबसे महत्वपूर्ण श्लोकों में से एक है। इसी प्रकार गीता 18.66 में "मामेकं शरणं व्रज" कहा गया है। अगला और अंतिम श्लोक (14.27) इस अध्याय का उपसंहार है।

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