भगवान कहते हैं — गुणातीत पुरुष सुख और दुःख में समान रहता है, अपने आप में स्थिर रहता है। उसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना — सब बराबर हैं। प्रिय और अप्रिय बातें उसे समान लगती हैं। वह धीर (स्थिर बुद्धि वाला) है। निन्दा और स्तुति उसे एक समान लगती हैं।
इसका यह अर्थ नहीं कि ऐसा व्यक्ति भावनाशून्य होता है। बल्कि वह इतना गहरे आत्मसुख में स्थित होता है कि बाहरी चीजें उसकी भीतरी शांति को हिला नहीं पातीं।
"स्वस्थ" शब्द बहुत सुंदर है — "स्व" में "स्थित" — अपने असली स्वरूप में टिका हुआ। यही सच्चा स्वास्थ्य है।