📿 श्लोक संग्रह

समदुःखसुखः स्वस्थः

गीता 14.24 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥
समदुःखसुखः
दुःख-सुख में सम
स्वस्थः
अपने आप में स्थित
समलोष्टाश्मकाञ्चनः
मिट्टी, पत्थर, सोना — सब समान
तुल्यप्रियाप्रियः
प्रिय-अप्रिय में समान
धीरः
धीर/स्थिर बुद्धि वाला
तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः
निन्दा-स्तुति में समान

भगवान कहते हैं — गुणातीत पुरुष सुख और दुःख में समान रहता है, अपने आप में स्थिर रहता है। उसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना — सब बराबर हैं। प्रिय और अप्रिय बातें उसे समान लगती हैं। वह धीर (स्थिर बुद्धि वाला) है। निन्दा और स्तुति उसे एक समान लगती हैं।

इसका यह अर्थ नहीं कि ऐसा व्यक्ति भावनाशून्य होता है। बल्कि वह इतना गहरे आत्मसुख में स्थित होता है कि बाहरी चीजें उसकी भीतरी शांति को हिला नहीं पातीं।

"स्वस्थ" शब्द बहुत सुंदर है — "स्व" में "स्थित" — अपने असली स्वरूप में टिका हुआ। यही सच्चा स्वास्थ्य है।

यह और अगला श्लोक (14.25) मिलकर गुणातीत पुरुष के बाहरी लक्षणों का पूरा चित्र बनाते हैं। ये लक्षण गीता 2.56-57 के स्थितप्रज्ञ के लक्षणों से मिलते-जुलते हैं।

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