भगवान कहते हैं — जो उदासीन (साक्षी) की भाँति स्थिर बैठा रहता है, गुणों से विचलित नहीं होता, "गुण ही गुणों में बरत रहे हैं" — यह जानकर जो अपने आत्मस्वरूप में स्थिर रहता है और डोलता नहीं — वह गुणातीत है।
यह बहुत सुंदर दृष्टान्त है। जैसे पहाड़ पर बैठा व्यक्ति नीचे के बाजार की भीड़ को देखता है — वह उसमें शामिल नहीं है, पर देख सकता है। वैसे ही गुणातीत व्यक्ति शरीर और मन में गुणों का खेल देखता है, पर स्वयं उससे अछूता रहता है।
"गुणा वर्तन्ते" — यह वाक्य गीता 3.28 की प्रतिध्वनि है। जो यह जान लेता है कि सब कर्म गुणों के हैं, आत्मा का नहीं — वही सच में स्थिर है।