📿 श्लोक संग्रह

उदासीनवदासीनो

गीता 14.23 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥
उदासीनवत्
उदासीन की भाँति
आसीनः
बैठा हुआ
गुणैः
गुणों से
यः
जो
न विचाल्यते
विचलित नहीं होता
गुणाः वर्तन्ते
गुण बरत रहे हैं
इति एव
ऐसा जानकर
यः अवतिष्ठति
जो स्थिर रहता है
न इङ्गते
डोलता नहीं

भगवान कहते हैं — जो उदासीन (साक्षी) की भाँति स्थिर बैठा रहता है, गुणों से विचलित नहीं होता, "गुण ही गुणों में बरत रहे हैं" — यह जानकर जो अपने आत्मस्वरूप में स्थिर रहता है और डोलता नहीं — वह गुणातीत है।

यह बहुत सुंदर दृष्टान्त है। जैसे पहाड़ पर बैठा व्यक्ति नीचे के बाजार की भीड़ को देखता है — वह उसमें शामिल नहीं है, पर देख सकता है। वैसे ही गुणातीत व्यक्ति शरीर और मन में गुणों का खेल देखता है, पर स्वयं उससे अछूता रहता है।

"गुणा वर्तन्ते" — यह वाक्य गीता 3.28 की प्रतिध्वनि है। जो यह जान लेता है कि सब कर्म गुणों के हैं, आत्मा का नहीं — वही सच में स्थिर है।

यह श्लोक गुणातीत पुरुष के आंतरिक भाव का वर्णन करता है। अगले दो श्लोकों (14.24-25) में उसके बाहरी व्यवहार के और लक्षण बताए जाएँगे।

अध्याय 14 · 23 / 27
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