📿 श्लोक संग्रह

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः

गीता 2.56 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
दुःखेषु
दुःखों में
अनुद्विग्नमनाः
विचलित मन वाला नहीं
सुखेषु
सुखों में
विगतस्पृहः
लालसा से रहित
वीतरागभयक्रोधः
राग, भय और क्रोध से मुक्त
स्थितधीः
स्थिर बुद्धि वाला
मुनिः
मुनि
उच्यते
कहा जाता है

अर्जुन ने कृष्ण से पूछा था — स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाला) व्यक्ति कैसा होता है? इस श्लोक में कृष्ण उसका उत्तर देते हैं। ऐसा व्यक्ति दुःख आने पर घबराता नहीं और सुख आने पर उसमें डूबता नहीं।

तीन चीज़ें जो उसमें नहीं होतीं — राग (किसी चीज़ से चिपकना), भय (किसी से डरना), और क्रोध (किसी पर गुस्सा)। जो व्यक्ति इन तीनों से मुक्त है, उसे स्थितप्रज्ञ मुनि कहते हैं।

जैसे गहरे समुद्र की तलहटी में लहरें नहीं पहुँचतीं — ऊपर तूफ़ान हो, लहरें उठें, लेकिन नीचे शांति रहती है — वैसे ही स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का मन बाहरी परिस्थितियों से विचलित नहीं होता। यह गुण एक दिन में नहीं आता, लेकिन इसका अभ्यास किया जा सकता है।

यह श्लोक गीता के दूसरे अध्याय से है। अर्जुन ने (2.54 में) पूछा — स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की पहचान क्या है? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता है? इस प्रश्न के उत्तर में कृष्ण 2.55 से 2.72 तक स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताते हैं।

परंपरा में इस भाग को 'स्थितप्रज्ञ प्रकरण' कहा जाता है और यह गीता के सबसे प्रसिद्ध भागों में से एक माना जाता रहा है।

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