📿 श्लोक संग्रह

यः सर्वत्रानभिस्नेहः

गीता 2.57 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
यः सर्वत्र
जो सभी जगह
अनभिस्नेहः
आसक्ति रहित
तत् तत् प्राप्य
वह-वह (शुभ-अशुभ) पाकर
शुभाशुभम्
शुभ और अशुभ को
न अभिनन्दति
प्रसन्न नहीं होता
न द्वेष्टि
द्वेष नहीं करता
तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता
उसकी प्रज्ञा स्थिर है

कृष्ण स्थितप्रज्ञ की और एक पहचान बताते हैं — जो सर्वत्र आसक्ति रहित है, शुभ पाकर अत्यंत प्रसन्न नहीं होता और अशुभ पाकर द्वेष नहीं करता — उसकी प्रज्ञा स्थिर है। यह समता का सबसे सुंदर वर्णन है।

यह भावहीनता नहीं है। स्थितप्रज्ञ महसूस करता है — लेकिन उसके भाव उसे बहाते नहीं। जैसे नाव पानी पर चलती है लेकिन पानी नाव में नहीं आता — वैसे ही स्थितप्रज्ञ संसार में रहता है लेकिन संसार उसके भीतर नहीं आता।

भगवद्गीता में 2.55–2.72 तक स्थितप्रज्ञ का वर्णन है। यह 2.54 में अर्जुन के प्रश्न का उत्तर है — स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है, बैठता है, चलता है?

यहाँ 'अनभिस्नेह' — आसक्ति न होना — केवल विरक्ति नहीं है, बल्कि संसार के साथ एक स्वस्थ, संतुलित संबंध है।

अध्याय 2 · 57 / 72
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