कृष्ण एक अत्यंत सरल और सुंदर उपमा देते हैं — जैसे कछुआ खतरे में अपने सभी अंग अपने कवच के भीतर समेट लेता है — वैसे ही जो अपनी इंद्रियों को इंद्रिय-विषयों से समेट लेता है, उसकी प्रज्ञा स्थिर है।
यह उपमा बच्चों को भी आसानी से समझ में आ जाती है। कछुआ बाहर का खतरा महसूस करते ही भीतर हो जाता है। वैसे ही स्थितप्रज्ञ बाहरी लोभ-प्रलोभन आने पर अपनी इंद्रियों को भीतर खींच लेता है।