कृष्ण एक बहुत गहरी बात कहते हैं — जो व्यक्ति इंद्रियों को ज़बरदस्ती रोकता है, उसके विषय (बाहरी भोग) तो रुक जाते हैं, लेकिन भीतर का रस (आसक्ति, स्वाद) नहीं रुकता। वह रस तब रुकता है जब व्यक्ति परम तत्व का दर्शन करता है।
यह बिलकुल सच्ची बात है — डायटिंग करने वाला व्यक्ति मिठाई नहीं खाता, लेकिन मिठाई देखकर मन में इच्छा तो उठती है। बाहर से रोकना आसान है, भीतर से छूटना कठिन। लेकिन जब कोई बड़ा आनंद मिल जाए, तो छोटे आनंद अपने आप छूट जाते हैं।
जैसे जो बच्चा कंचे खेलता था, जब उसे क्रिकेट खेलने का मौक़ा मिलता है तो कंचे अपने आप छूट जाते हैं — बड़ा आनंद मिलने पर छोटा आनंद तुच्छ लगने लगता है।