कृष्ण उत्तर देते हैं — जब मनुष्य मन की सारी कामनाओं को त्याग देता है और अपनी आत्मा में ही अपने आप संतुष्ट रहता है, तब उसे स्थितप्रज्ञ कहते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसा व्यक्ति कुछ करता नहीं या कुछ चाहता नहीं। बल्कि उसकी संतुष्टि बाहरी चीज़ों पर निर्भर नहीं रहती। जैसे एक भरा हुआ कुआँ — उसे बाहर से पानी डालने की ज़रूरत नहीं, वह अपने भीतर से भरा है।
बच्चों के लिए सोचिए — जब कोई बच्चा अपने खेल में इतना खोया हो कि उसे खिलौनों की, मिठाई की कोई चिंता न रहे — वह एक तरह का स्थितप्रज्ञ भाव है।