📿 श्लोक संग्रह

प्रजहाति यदा कामान्

गीता 2.55 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥
प्रजहाति
त्याग देता है
यदा
जब
कामान्
कामनाओं को
सर्वान्
सब
मनोगतान्
मन में स्थित
आत्मनि एव
आत्मा में ही
आत्मना
अपने आप से
तुष्टः
संतुष्ट
स्थितप्रज्ञः
स्थितप्रज्ञ
तदा उच्यते
तब कहा जाता है

कृष्ण उत्तर देते हैं — जब मनुष्य मन की सारी कामनाओं को त्याग देता है और अपनी आत्मा में ही अपने आप संतुष्ट रहता है, तब उसे स्थितप्रज्ञ कहते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसा व्यक्ति कुछ करता नहीं या कुछ चाहता नहीं। बल्कि उसकी संतुष्टि बाहरी चीज़ों पर निर्भर नहीं रहती। जैसे एक भरा हुआ कुआँ — उसे बाहर से पानी डालने की ज़रूरत नहीं, वह अपने भीतर से भरा है।

बच्चों के लिए सोचिए — जब कोई बच्चा अपने खेल में इतना खोया हो कि उसे खिलौनों की, मिठाई की कोई चिंता न रहे — वह एक तरह का स्थितप्रज्ञ भाव है।

यह 'स्थितप्रज्ञ प्रकरण' का पहला उत्तर श्लोक है। कृष्ण ने सबसे पहले कामना-त्याग और आत्म-संतुष्टि को स्थितप्रज्ञ का प्रमुख लक्षण बताया।

आगे के श्लोकों (2.56-72) में इसी विषय को और विस्तार से समझाया गया है।

अध्याय 2 · 55 / 72
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