📿 श्लोक संग्रह

प्रकाशं च प्रवृत्तिं च

गीता 14.22 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
श्रीभगवानुवाच — प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥
श्रीभगवानुवाच
भगवान बोले
प्रकाशम्
प्रकाश (सत्त्व का लक्षण)
प्रवृत्तिम्
प्रवृत्ति (रजस् का लक्षण)
मोहम्
मोह (तमस् का लक्षण)
पाण्डव
हे पाण्डव
न द्वेष्टि
द्वेष नहीं करता
सम्प्रवृत्तानि
प्रवृत्त होने पर
न निवृत्तानि
निवृत्त होने पर
काङ्क्षति
इच्छा करता

भगवान कहते हैं — हे पाण्डव, गुणातीत पुरुष प्रकाश (सत्त्व का कार्य), प्रवृत्ति (रजस् का कार्य) और मोह (तमस् का कार्य) — इनसे न तो प्रवृत्त होने पर द्वेष करता है, और न ही निवृत्त होने पर उनकी कामना करता है।

इसे ऐसे समझो — जब मन में ज्ञान का प्रकाश आए, तो गुणातीत व्यक्ति उसमें अहंकार नहीं करता। जब कर्म की प्रवृत्ति आए, तो उससे परेशान नहीं होता। जब कभी मोह या सुस्ती आ जाए, तो उससे घबराता नहीं। और जब ये चले जाएँ, तो उनके लिए तड़पता नहीं।

वह साक्षी भाव से इन सबको देखता है — जैसे किनारे बैठा व्यक्ति नदी की लहरों को आते-जाते देखता है, पर स्वयं भीगता नहीं।

यह अर्जुन के प्रश्न (14.21) का उत्तर शुरू होता है। भगवान पहले बताते हैं कि गुणातीत व्यक्ति गुणों के कार्यों से न आकर्षित होता है, न विकर्षित। अगले श्लोकों में और लक्षण बताए जाएँगे।

अध्याय 14 · 22 / 27
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