भगवान कहते हैं — हे पाण्डव, गुणातीत पुरुष प्रकाश (सत्त्व का कार्य), प्रवृत्ति (रजस् का कार्य) और मोह (तमस् का कार्य) — इनसे न तो प्रवृत्त होने पर द्वेष करता है, और न ही निवृत्त होने पर उनकी कामना करता है।
इसे ऐसे समझो — जब मन में ज्ञान का प्रकाश आए, तो गुणातीत व्यक्ति उसमें अहंकार नहीं करता। जब कर्म की प्रवृत्ति आए, तो उससे परेशान नहीं होता। जब कभी मोह या सुस्ती आ जाए, तो उससे घबराता नहीं। और जब ये चले जाएँ, तो उनके लिए तड़पता नहीं।
वह साक्षी भाव से इन सबको देखता है — जैसे किनारे बैठा व्यक्ति नदी की लहरों को आते-जाते देखता है, पर स्वयं भीगता नहीं।