📿 श्लोक संग्रह

कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतान्

गीता 14.21 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 14 — गुणत्रयविभागयोग
अर्जुन उवाच — कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥
अर्जुन उवाच
अर्जुन बोले
कैः लिङ्गैः
किन लक्षणों से
त्रीन्
तीन
गुणान् एतान्
इन गुणों को
अतीतः
पार किया हुआ
भवति
होता है
प्रभो
हे प्रभु
किम् आचारः
कैसा आचरण
कथम्
कैसे
एतान् त्रीन् गुणान्
इन तीन गुणों को
अतिवर्तते
पार करता है

अर्जुन पूछते हैं — हे प्रभु, जो इन तीन गुणों को पार कर चुका है, उसकी पहचान क्या है? उसके लक्षण क्या हैं? वह कैसा आचरण करता है? और कैसे कोई इन तीन गुणों को पार करता है?

अर्जुन के ये तीन प्रश्न बहुत व्यावहारिक हैं — (1) पहचान कैसे करें कि कोई गुणातीत है? (2) उसका व्यवहार कैसा होता है? (3) गुणातीत होने का उपाय क्या है?

यह प्रश्न गीता के दूसरे अध्याय (2.54) में "स्थितप्रज्ञ" के बारे में पूछे गए प्रश्न जैसा ही है। अर्जुन हमेशा व्यावहारिक ज्ञान चाहते हैं — सिर्फ सिद्धान्त नहीं।

इस प्रश्न के उत्तर में भगवान अगले पाँच श्लोकों (14.22-26) में गुणातीत पुरुष का विस्तृत वर्णन करेंगे। ये श्लोक गीता 2.55-72 के स्थितप्रज्ञ वर्णन की तरह ही महत्वपूर्ण हैं।

अध्याय 14 · 21 / 27
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