भगवान कहते हैं — जो शरीरधारी इन तीनों गुणों को — जो शरीर के कारण उत्पन्न होते हैं — पार कर जाता है, वह जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और दुःख से मुक्त होकर अमृत (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
यह अध्याय का सबसे आशापूर्ण श्लोक है। भगवान कह रहे हैं कि गुणों से बँधा होना हमारी नियति नहीं है — हम इनसे पार जा सकते हैं। और जब पार जाते हैं, तो जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त हो जाता है।
"देहसमुद्भवान्" बताता है कि ये गुण शरीर से संबंधित हैं, आत्मा से नहीं। आत्मा स्वयं गुणातीत है — बस अज्ञान के कारण वह गुणों से बँधी प्रतीत होती है।