यह दूसरे अध्याय का अंतिम श्लोक है। कृष्ण कहते हैं — हे अर्जुन, यही ब्राह्मी स्थिति है, अर्थात ब्रह्म में स्थिति। इसे प्राप्त करके मनुष्य फिर कभी मोह में नहीं पड़ता।
और सबसे सुंदर बात — अंत काल में भी यदि यह स्थिति प्राप्त हो जाए, तो ब्रह्मनिर्वाण (मोक्ष) मिल जाता है। अर्थात देर कभी नहीं होती — जीवन के अंतिम क्षण में भी यह ज्ञान मोक्ष दे सकता है।
जैसे एक लंबी यात्रा के बाद जब घर का दरवाज़ा दिखता है — वैसे ही यह श्लोक पूरे अध्याय के अंत में एक आश्वासन देता है कि यह मार्ग मोक्ष तक ले जाता है।