कृष्ण स्थितप्रज्ञ का अंतिम और सबसे सुंदर चित्र खींचते हैं — जो पुरुष सब कामनाओं को छोड़कर, बिना किसी लालसा के, ममता-रहित और अहंकार-रहित होकर विचरता है — वह शांति को प्राप्त होता है। यह मुक्त जीवन का वर्णन है।
तीन बातें — निःस्पृह (लालसा नहीं), निर्मम (मेरा-मेरा नहीं), निरहंकार (मैं-मैं नहीं)। जब ये तीनों न हों, तो जो बचता है वह शांति है। यह न वैराग्य है, न पलायन — यह एक स्वतंत्र, जागरूक जीवन है।