📿 श्लोक संग्रह

विहाय कामान्यः सर्वान्

गीता 2.71 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥
विहाय
छोड़कर
कामान् यः सर्वान्
जो सभी कामनाएँ
पुमान्
पुरुष
चरति
विचरता है
निःस्पृहः
स्पृहा (लालसा) से रहित
निर्ममः
ममता-रहित, 'मेरा' भाव से मुक्त
निरहङ्कारः
अहंकार से रहित
शान्तिम् अधिगच्छति
शांति को प्राप्त होता है

कृष्ण स्थितप्रज्ञ का अंतिम और सबसे सुंदर चित्र खींचते हैं — जो पुरुष सब कामनाओं को छोड़कर, बिना किसी लालसा के, ममता-रहित और अहंकार-रहित होकर विचरता है — वह शांति को प्राप्त होता है। यह मुक्त जीवन का वर्णन है।

तीन बातें — निःस्पृह (लालसा नहीं), निर्मम (मेरा-मेरा नहीं), निरहंकार (मैं-मैं नहीं)। जब ये तीनों न हों, तो जो बचता है वह शांति है। यह न वैराग्य है, न पलायन — यह एक स्वतंत्र, जागरूक जीवन है।

भगवद्गीता के अनुसार यह श्लोक 2.70 के बाद आता है जहाँ समुद्र की उपमा दी थी। 2.71 में कामना-त्याग का सीधा कथन है — यह सांख्ययोग अध्याय के अंत का संकेत है।

इसके बाद 2.72 आता है जो ब्राह्मी स्थिति का वर्णन करता है — यह 2.71 के निष्कर्ष का चरम रूप है।

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