कृष्ण गीता की सबसे सुंदर उपमाओं में से एक देते हैं — जैसे समुद्र सदा भरा रहता है, अनेक नदियाँ उसमें गिरती रहती हैं, लेकिन समुद्र न बढ़ता है न घटता है, विचलित नहीं होता — वैसे ही जिस व्यक्ति में सब कामनाएँ समा जाती हैं लेकिन वह विचलित नहीं होता, वही शांति पाता है।
समुद्र की इस उपमा को ध्यान से समझिए — समुद्र नदियों को मना नहीं करता, रोकता नहीं। नदियाँ आती हैं, समुद्र में समा जाती हैं। लेकिन समुद्र वही रहता है। वैसे ही स्थितप्रज्ञ के मन में विचार आते हैं, कामनाएँ उठती हैं, लेकिन वे उसे विचलित नहीं करतीं।
जो कामनाओं के पीछे दौड़ता है — 'कामकामी' — वह शांति नहीं पा सकता। शांति उसे मिलती है जो समुद्र की तरह स्थिर है।