📿 श्लोक संग्रह

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं

गीता 2.70 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥
आपूर्यमाणम्
सदा भरा रहने वाला
अचलप्रतिष्ठम्
अचल, स्थिर
समुद्रम्
समुद्र में
आपः
जल (नदियाँ)
प्रविशन्ति
प्रवेश करते हैं
यद्वत्
जैसे
तद्वत्
वैसे ही
कामाः
कामनाएँ
यम्
जिसमें
सर्वे
सब
सः
वह
शान्तिम् आप्नोति
शांति प्राप्त करता है
न कामकामी
कामनाओं का कामी नहीं

कृष्ण गीता की सबसे सुंदर उपमाओं में से एक देते हैं — जैसे समुद्र सदा भरा रहता है, अनेक नदियाँ उसमें गिरती रहती हैं, लेकिन समुद्र न बढ़ता है न घटता है, विचलित नहीं होता — वैसे ही जिस व्यक्ति में सब कामनाएँ समा जाती हैं लेकिन वह विचलित नहीं होता, वही शांति पाता है।

समुद्र की इस उपमा को ध्यान से समझिए — समुद्र नदियों को मना नहीं करता, रोकता नहीं। नदियाँ आती हैं, समुद्र में समा जाती हैं। लेकिन समुद्र वही रहता है। वैसे ही स्थितप्रज्ञ के मन में विचार आते हैं, कामनाएँ उठती हैं, लेकिन वे उसे विचलित नहीं करतीं।

जो कामनाओं के पीछे दौड़ता है — 'कामकामी' — वह शांति नहीं पा सकता। शांति उसे मिलती है जो समुद्र की तरह स्थिर है।

यह श्लोक स्थितप्रज्ञ प्रकरण के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से है। समुद्र की उपमा सदियों से भारतीय दर्शन में मन की स्थिरता समझाने के लिए प्रयुक्त होती रही है।

गीता 2.55 (प्रजहाति यदा कामान्) में कामना-त्याग की बात कही, और अब 2.70 में समझाया कि त्याग का अर्थ 'भागना' नहीं, बल्कि 'विचलित न होना' है।

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