📿 श्लोक संग्रह

या निशा सर्वभूतानाम्

गीता 2.69 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 2 — सांख्ययोग
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥
या निशा
जो रात है
सर्वभूतानाम्
सब प्राणियों के लिए
तस्याम् जागर्ति
उसमें जागता है
संयमी
संयमी पुरुष
यस्याम् जाग्रति भूतानि
जिसमें प्राणी जागते हैं
सा निशा
वह रात है
पश्यतः मुनेः
देखने वाले मुनि के लिए

कृष्ण एक बहुत गहरी उपमा देते हैं — जो सब प्राणियों के लिए रात है, उसमें संयमी जागता है; और जिसमें सब प्राणी जागते हैं — वह देखने वाले मुनि के लिए रात है। आत्म-तत्व की जागृति वह है जिसे सांसारिक लोग नहीं जानते।

आसान शब्दों में — सांसारिक लोगों का 'जागना' भौतिक वस्तुओं में है; ज्ञानी का 'जागना' आत्मा में है। जो सांसारिक लोगों के लिए अँधेरा है (आत्म-ज्ञान) — उसमें ज्ञानी जागता है। और जो सांसारिक लोगों के लिए प्रकाश है (भोग-विलास) — वह ज्ञानी के लिए जैसे रात है।

भगवद्गीता का यह श्लोक भारतीय दर्शन की सबसे सुंदर उपमाओं में से एक है। यह द्वंद्व का उलट-फेर बताता है — कि ज्ञानी और अज्ञानी की दुनियाएँ अलग होती हैं।

'पश्यतः मुनेः' — जो देखता है उस मुनि के लिए — यहाँ 'देखना' का अर्थ है आत्म-दर्शन करना।

अध्याय 2 · 69 / 72
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