📿 श्लोक संग्रह

उद्धरेदात्मनात्मानं

गीता 6.5 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — ध्यानयोग
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
उद्धरेत्
उद्धार करे
आत्मना
स्वयं (अपने द्वारा)
आत्मानम्
अपने आपको
नहीं
अवसादयेत्
गिराए, हतोत्साहित करे
आत्मा
स्वयं
एव
ही
हि
निश्चय ही
बन्धुः
मित्र, सहायक
रिपुः
शत्रु

इस श्लोक में भगवान कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को अपने बल पर अपना उद्धार करना चाहिए और स्वयं को गिरने नहीं देना चाहिए। कोई दूसरा हमें तब तक नहीं उठा सकता जब तक हम ख़ुद उठने का प्रयास न करें।

यहाँ एक बहुत गहरी बात सरल शब्दों में कही गई है — तुम ही अपने सबसे बड़े मित्र हो और तुम ही अपने सबसे बड़े शत्रु। जब हम अच्छे काम करते हैं, नियमित रहते हैं, मेहनत करते हैं — तो हम अपने मित्र बन जाते हैं। जब आलस करते हैं, बुरी आदतें पालते हैं — तो हम ख़ुद अपने दुश्मन बन जाते हैं।

जैसे एक बच्चा जब रोज़ सुबह उठकर पढ़ाई करता है, तो वह अपनी मदद कर रहा है। लेकिन जब वही बच्चा दिन भर खेलता रहे और पढ़ाई न करे, तो वह अपना ही नुकसान कर रहा है। चुनाव हमारे अपने हाथ में है।

यह श्लोक गीता के छठे अध्याय ध्यानयोग से है। इस अध्याय में कृष्ण ध्यान और आत्म-संयम की विधि बताते हैं। यह श्लोक उस शिक्षा की नींव रखता है — पहले अपने आपको संभालो, फिर ध्यान में बैठो।

परंपरा में इस श्लोक को आत्म-निर्भरता और मानसिक दृढ़ता का प्रतीक माना जाता रहा है।

अध्याय 6 · 5 / 47
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