यह श्लोक 6.5 का विस्तार है। जो अपने मन को साध लेता है, उसके लिए वही मन सबसे बड़ा मित्र बन जाता है। मन मित्र बने तो जीवन में शांति रहती है, काम सही होते हैं, निर्णय सटीक होते हैं।
लेकिन जो अपने मन को नहीं जीत पाया — उसके लिए वही मन दुश्मन की तरह काम करता है। वह बार-बार गलत रास्ते पर ले जाता है, लालच दिखाता है, डर पैदा करता है। इसीलिए कृष्ण कहते हैं — पहले मन को जीतो।