📿 श्लोक संग्रह

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य

गीता 6.6 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥
बन्धुः आत्मा
मित्र है अपना आप
आत्मनः तस्य
उसके लिए
येन आत्मा एव
जिसने स्वयं ही
आत्मना जितः
अपने आप को जीता
अनात्मनः तु
जिसने नहीं जीता उसके लिए
शत्रुत्वे वर्तेत
शत्रु की तरह बर्तता है
आत्मैव शत्रुवत्
अपना आप ही शत्रु जैसा

यह श्लोक 6.5 का विस्तार है। जो अपने मन को साध लेता है, उसके लिए वही मन सबसे बड़ा मित्र बन जाता है। मन मित्र बने तो जीवन में शांति रहती है, काम सही होते हैं, निर्णय सटीक होते हैं।

लेकिन जो अपने मन को नहीं जीत पाया — उसके लिए वही मन दुश्मन की तरह काम करता है। वह बार-बार गलत रास्ते पर ले जाता है, लालच दिखाता है, डर पैदा करता है। इसीलिए कृष्ण कहते हैं — पहले मन को जीतो।

6.5 में कहा था — स्वयं अपना मित्र या शत्रु बनता है मनुष्य। 6.6 में स्पष्ट होता है कि यह मित्र-शत्रु का खेल मन के जीतने या न जीतने पर निर्भर है।

परंपरा में इसे 'जितात्मा' और 'अजितात्मा' की अवस्था कहा गया है — जिसने आत्मा को जीता और जिसने नहीं जीता। यह विभाजन ही मनुष्य के अनुभव का मूल है।

अध्याय 6 · 6 / 47
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