📿 श्लोक संग्रह

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु

गीता 6.4 भगवद्गीता
📖 भगवद्गीता, अध्याय 6 — आत्मसंयमयोग
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥
यदा हि
जब ही
न इन्द्रियार्थेषु
इन्द्रिय-विषयों में नहीं
न कर्मसु अनुषज्जते
कर्मों में आसक्त नहीं होता
सर्वसंकल्पसंन्यासी
सब संकल्पों का त्यागी
योगारूढः
योग में आरूढ — स्थित
तदा उच्यते
तब कहलाता है

कृष्ण योगारूढ की पहचान बताते हैं। जब किसी व्यक्ति का मन न तो इन्द्रियों के सुखों की ओर खिंचता है, न किसी कर्म के फल में उलझता है — जब वह सब संकल्पों को छोड़ चुका है — तब वह योगारूढ कहलाता है।

यह अवस्था बड़ी शांत होती है। इसमें न कोई चाहत है, न कोई डर। जैसे एक बुजुर्ग जिसने जीवन में सब कुछ देखा और अब बस आराम से बैठा है — उसके मन में न लालच है, न चिंता। वही भाव योगारूढ का है।

यह 6.3 का अगला चरण है। पहले कहा — योग में चढ़ने के लिए कर्म चाहिए। अब बताया — योगारूढ होने के बाद कैसी स्थिति होती है। संकल्पों का त्याग ही पूर्णता की निशानी है।

पतञ्जलि के योगसूत्रों में भी 'वैराग्य' को इसी प्रकार परिभाषित किया गया है — विषयों में रुचि का क्षीण होना। गीता का यह श्लोक उसी भाव को व्यक्त करता है।

अध्याय 6 · 4 / 47
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