कृष्ण योगारूढ की पहचान बताते हैं। जब किसी व्यक्ति का मन न तो इन्द्रियों के सुखों की ओर खिंचता है, न किसी कर्म के फल में उलझता है — जब वह सब संकल्पों को छोड़ चुका है — तब वह योगारूढ कहलाता है।
यह अवस्था बड़ी शांत होती है। इसमें न कोई चाहत है, न कोई डर। जैसे एक बुजुर्ग जिसने जीवन में सब कुछ देखा और अब बस आराम से बैठा है — उसके मन में न लालच है, न चिंता। वही भाव योगारूढ का है।